श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.11.19

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 11 · अथैकादशोऽध्यायः

सोऽनन्तोऽन्तकरः कालोऽनादिरादिकृदव्ययः।

जनं जनेन जनयन्मारयन्मृत्युनान्तकम्॥ १९

so'nanto'ntakaraḥ kālo'nādirādikṛdavyayaḥ|

janaṃ janena janayanmārayanmṛtyunāntakam|| 19

अर्थ

ध्रुव! वे कालस्वरूप अव्यय परमात्मा ही स्वयं अन्तरहित होकर भी जगत‍्का अन्त करनेवाले हैं तथा अनादि होकर भी सबके आदिकर्ता हैं। वे ही एक जीवसे दूसरे जीवको उत्पन्‍न कर संसारकी सृष्टि करते हैं तथा मृत्युके द्वारा मारनेवालेको भी मरवाकर उसका संहार करते हैं॥ १९॥✎ 379 380

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #379 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #380 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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