श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.11.27

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 11 · अथैकादशोऽध्यायः

तमेव मृत्युममृतं तात दैवं

सर्वात्मनोपेहि जगत्परायणम्।

यस्मै बलिं विश्‍वसृजो हरन्ति

गावो यथा वै नसि दामयन्त्रिताः॥ २७

tameva mṛtyumamṛtaṃ tāta daivaṃ

sarvātmanopehi jagatparāyaṇam|

yasmai baliṃ viśvasṛjo haranti

gāvo yathā vai nasi dāmayantritāḥ|| 27

अर्थ

जिस प्रकार नाकमें नकेल पड़े हुए बैल अपने मालिकका बोझा ढोते रहते हैं, उसी प्रकार जगत‍्की रचना करनेवाले ब्रह्मादि भी नामरूप डोरीसे बँधे हुए उन्हींकी आज्ञाका पालन करते हैं। वे अभक्तोंके लिये मृत्युरूप और भक्तोंके लिये अमृतरूप हैं तथा संसारके एकमात्र आश्रय हैं। तात! तुम सब प्रकार उन्हीं परमात्माकी शरण लो॥ २७॥✎ 381

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #381 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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