श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.11.5

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 11 · अथैकादशोऽध्यायः

स तान् पृषत्कैरभिधावतो मृधे

निकृत्तबाहूरुशिरोधरोदरान् ।

निनाय लोकं परमर्कमण्डलं

व्रजन्ति निर्भिद्य यमूर्ध्वरेतसः॥ ५

sa tān pṛṣatkairabhidhāvato mṛdhe

nikṛttabāhūruśirodharodarān |

nināya lokaṃ paramarkamaṇḍalaṃ

vrajanti nirbhidya yamūrdhvaretasaḥ|| 5

अर्थ

उन्हें सामने आते देख ध्रुवजीने अपने बाणोंद्वारा उनकी भुजाएँ, जाँघें, कंधे और उदर आदि अंग-प्रत्यंगोंको छिन्‍न-भिन्‍न कर उन्हें उस सर्वश्रेष्ठ लोक (सत्यलोक)में भेज दिया, जिसमें ऊर्ध्वरेता मुनिगण सूर्यमण्डलका भेदन करके जाते हैं॥ ५॥✎ 1599

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1599 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: (सत्यलोक)-में → (सत्यलोक)में

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