श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.12.11

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 12 · अथ द्वादशोऽध्यायः

सर्वात्मन्यच्युतेऽसर्वे तीव्रौघां भक्तिमुद्वहन्।

ददर्शात्मनि भूतेषु तमेवावस्थितं विभुम्॥ ११

sarvātmanyacyute'sarve tīvraughāṃ bhaktimudvahan|

dadarśātmani bhūteṣu tamevāvasthitaṃ vibhum|| 11

अर्थ

सर्वोपाधिशून्य सर्वात्मा श्रीअच्युतमें प्रबल वेगयुक्त भक्तिभाव रखते हुए ध्रुवजी अपनेमें और समस्त प्राणियोंमें सर्वव्यापक श्रीहरिको ही विराजमान देखने लगे॥ ११॥

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