॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 4.12.16
आत्मस्त्र्यपत्यसुहृदो बलमृद्धकोश-
मन्तःपुरं परिविहारभुवश्च रम्याः।
भूमण्डलं जलधिमेखलमाकलय्य
कालोपसृष्टमिति स प्रययौ विशालाम्॥ १६
ātmastryapatyasuhṛdo balamṛddhakośa-
mantaḥpuraṃ parivihārabhuvaśca ramyāḥ|
bhūmaṇḍalaṃ jaladhimekhalamākalayya
kālopasṛṣṭamiti sa prayayau viśālām|| 16
अर्थ
इस सम्पूर्ण दृश्य-प्रपंचको अविद्यारचित स्वप्न और गन्धर्वनगरके समान मायासे अपनेमें ही कल्पित मानकर और यह समझकर कि शरीर, स्त्री, पुत्र, मित्र, सेना, भरापूरा खजाना, जनाने महल, सुरम्य विहारभूमि और समुद्रपर्यन्त भूमण्डलका राज्य—ये सभी कालके गालमें पड़े हुए हैं, वे बदरिकाश्रमको चले गये॥ १५-१६॥