॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 4.12.36
यद् भ्राजमानं स्वरुचैव सर्वतो
लोकास्त्रयो ह्यनु विभ्राजन्त एते।
यन्नाव्रजंजन्तुषु येऽननुग्रहा
व्रजन्ति भद्राणि चरन्ति येऽनिशम्॥ ३६
yad bhrājamānaṃ svarucaiva sarvato
lokāstrayo hyanu vibhrājanta ete|
yannāvrajaṃjantuṣu ye'nanugrahā
vrajanti bhadrāṇi caranti ye'niśam|| 36
अर्थ
यह दिव्य धाम अपने ही प्रकाशसे प्रकाशित है, इसीके प्रकाशसे तीनों लोक प्रकाशित हैं। इसमें जीवोंपर निर्दयता करनेवाले पुरुष नहीं जा सकते। यहाँ तो उन्हींकी पहुँच होती है, जो दिन-रात प्राणियोंके कल्याणके लिये शुभ कर्म ही करते रहते हैं॥ ३६॥