श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.12.8

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 12 · अथ द्वादशोऽध्यायः

मैत्रेय उवाच

स राजराजेन वराय चोदितो

ध्रुवो महाभागवतो महामतिः।

हरौ स वव्रेऽचलितां स्मृतिं यया

तरत्ययत्नेन दुरत्ययं तमः॥ ८

sa rājarājena varāya codito

dhruvo mahābhāgavato mahāmatiḥ|

harau sa vavre'calitāṃ smṛtiṃ yayā

taratyayatnena duratyayaṃ tamaḥ|| 8

अर्थ

श्रीमैत्रेयजी कहते हैं—विदुरजी! यक्षराज कुबेरने जब इस प्रकार वर माँगनेके लिये आग्रह किया, तब महाभागवत महामति ध्रुवजीने उनसे यही माँगा कि मुझे श्रीहरिकी अखण्ड स्मृति बनी रहे, जिससे मनुष्य सहज ही दुस्तर संसारसागरको पार कर जाता है॥ ८॥

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