श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.13.5

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 13 · अथ त्रयोदशोऽध्यायः

यास्ता देवर्षिणा तत्र वर्णिता भगवत्कथाः।

मह्यं शुश्रूषवे ब्रह्मन् कार्त्स्न्येनाचष्टुमर्हसि॥ ५

yāstā devarṣiṇā tatra varṇitā bhagavatkathāḥ|

mahyaṃ śuśrūṣave brahman kārtsnyenācaṣṭumarhasi|| 5

अर्थ

ब्रह्मन्! उस स्थानपर उन्होंने भगवान्‌की जिन-जिन लीला-कथाओंका वर्णन किया था, वे सब पूर्णरूपसे मुझे सुनाइये; मुझे उनके सुननेकी बड़ी इच्छा है॥ ५॥✎ 386

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #386 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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