वह जन्मसे ही शान्तचित्त, आसक्तिशून्य और समदर्शी था; तथा सम्पूर्ण लोकोंको अपनी आत्मामें और अपनी आत्माको सम्पूर्ण लोकोंमें स्थित देखता था॥ ७॥
स जन्मनोपशान्तात्मा निःसंगः समदर्शनः।
ददर्श लोके विततमात्मानं लोकमात्मनि॥ ७
वह जन्मसे ही शान्तचित्त, आसक्तिशून्य और समदर्शी था; तथा सम्पूर्ण लोकोंको अपनी आत्मामें और अपनी आत्माको सम्पूर्ण लोकोंमें स्थित देखता था॥ ७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.13.7 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 474) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/13/7/