श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.14.11

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 14 · अथ चतुर्दशोऽध्यायः

निरूपितः प्रजापालः स जिघांसति वै प्रजाः।

तथापि सान्त्वयेमामुं नास्मांस्तत्पातकं स्पृशेत्॥ ११

nirūpitaḥ prajāpālaḥ sa jighāṃsati vai prajāḥ|

tathāpi sāntvayemāmuṃ nāsmāṃstatpātakaṃ spṛśet|| 11

अर्थ

हमने इसे प्रजाकी रक्षा करनेके लिये नियुक्त किया था, यह आज उसीको नष्ट करनेपर तुला हुआ है। इतना सब होनेपर भी हमें इसे समझाना अवश्य चाहिये; ऐसा करनेसे इसके किये हुए पाप हमें स्पर्श नहीं करेंगे॥ ११॥✎ 1602

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1602 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: समझ-कर → समझकर

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