श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.14.28

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 14 · अथ चतुर्दशोऽध्यायः

तस्मान्मां कर्मभिर्विप्रा यजध्वं गतमत्सराः।

बलिं च मह्यं हरत मत्तोऽन्यः कोऽग्रभुक् पुमान्॥ २८

tasmānmāṃ karmabhirviprā yajadhvaṃ gatamatsarāḥ|

baliṃ ca mahyaṃ harata matto'nyaḥ ko'grabhuk pumān|| 28

अर्थ

इसलिये ब्राह्मणो! तुम मत्सरता छोड़कर अपने सभी कर्मोंद्वारा एक मेरा ही पूजन करो और मुझीको बलि समर्पण करो। भला मेरे सिवा और कौन अग्रपूजाका अधिकारी हो सकता है॥ २८॥

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