श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.14.40

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 14 · अथ चतुर्दशोऽध्यायः

चोरप्रायं जनपदं हीनसत्त्वमराजकम्।

लोकान्‍नावारयञ्छक्ता अपि तद्दोषदर्शिनः॥ ४०

coraprāyaṃ janapadaṃ hīnasattvamarājakam|

lokānnāvārayañchaktā api taddoṣadarśinaḥ|| 40

अर्थ

देखते ही वे समझ गये कि राजा वेनके मर जानेके कारण देशमें अराजकता फैल गयी है, राज्य शक्तिहीन हो गया है और चोर-डाकू बढ़ गये हैं; यह सारा उपद्रव लोगोंका धन लूटनेवाले तथा एक-दूसरेके खूनके प्यासे लुटेरोंका ही है। अपने तेजसे अथवा तपोबलसे लोगोंको ऐसी कुप्रवृत्तिसे रोकनेमें समर्थ होनेपर भी ऐसा करनेमें हिंसादि दोष देखकर उन्होंने इसका कोई निवारण नहीं किया॥ ३९-४०॥

यह अर्थ श्लोक 39–40 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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