श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.14.43

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 14 · अथ चतुर्दशोऽध्यायः

विनिश्चित्यैवमृषयो विपन्‍नस्य महीपतेः।

ममन्थुरूरुं तरसा तत्रासीद‍्बाहुको नरः॥ ४३

viniścityaivamṛṣayo vipannasya mahīpateḥ|

mamanthurūruṃ tarasā tatrāsīdbāhuko naraḥ|| 43

अर्थ

ऐसा निश्‍चय कर उन्होंने मृत राजाकी जाँघको बड़े जोरसे मथा तो उसमेंसे एक बौना पुरुष उत्पन्‍न हुआ॥ ४३॥

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें