श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.15.16

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 15 · अथ पञ्चदशोऽध्यायः

ब्रह्मा ब्रह्ममयं वर्म३ भारती हारमुत्तमम्।

हरिः सुदर्शनं चक्रं तत्पत्न्यव्याहतां श्रियम्॥ १६

brahmā brahmamayaṃ varma bhāratī hāramuttamam|

hariḥ sudarśanaṃ cakraṃ tatpatnyavyāhatāṃ śriyam|| 16

अर्थ

वायुने दो चँवर, धर्मने कीर्तिमयी माला, इन्द्रने मनोहर मुकुट, यमने दमन करनेवाला दण्ड, ब्रह्माने वेदमय कवच, सरस्वतीने सुन्दर हार, विष्णुभगवान्‌ने सुदर्शनचक्र, विष्णुप्रिया लक्ष्मीजीने अविचल सम्पत्ति, रुद्रने दस चन्द्राकार चिह्नोंसे युक्त कोषवाली तलवार, अम्बिकाजीने सौ चन्द्राकार चिह्नोंवाली ढाल, चन्द्रमाने अमृतमय अश्‍व, त्वष्टा (विश्‍वकर्मा)-ने सुन्दर रथ, अग्‍निने बकरे और गौके सींगोंका बना हुआ सुदृढ़ धनुष, सूर्यने तेजोमय बाण, पृथ्वीने चरणस्पर्श-मात्रसे अभीष्ट स्थानपर पहुँचा देनेवाली योगमयी पादुकाएँ, आकाशके अभिमानी द्यौ देवताने नित्य नूतन पुष्पोंकी माला, आकाशविहारी सिद्ध-गन्धर्वादिने नाचने-गाने, बजाने और अन्तर्धान हो जानेकी शक्तियाँ, ऋषियोंने अमोघ आशीर्वाद, समुद्रने अपनेसे उत्पन्‍न हुआ शंख तथा सातों समुद्र, पर्वत और नदियोंने उनके रथके लिये बेरोक-टोक मार्ग उपहारमें दिये। इसके पश्चात् सूत, मागध और वन्दीजन उनकी स्तुति करनेके लिये उपस्थित हुए॥ १५—२०॥✎ 391

यह अर्थ श्लोक 15–20 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

टिप्पणियाँ

  1. ३

    प्रा० पा०—धर्मं।

    (मुद्रित पृष्ठ 484)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #391 शब्दोंके बीचका स्थान: विष्णुभगवान् ने → विष्णुभगवान्‌ने

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