श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.15.24

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 15 · अथ पञ्चदशोऽध्यायः

महद‍्गुणानात्मनि कर्तुमीशः

कः स्तावकैः स्तावयतेऽसतोऽपि।

तेऽस्याभविष्यन्‍निति विप्रलब्धो

जनावहासं कुमतिर्न वेद॥ २४

mahadguṇānātmani kartumīśaḥ

kaḥ stāvakaiḥ stāvayate'sato'pi|

te'syābhaviṣyanniti vipralabdho

janāvahāsaṃ kumatirna veda|| 24

अर्थ

महान् गुणोंको धारण करनेमें समर्थ होनेपर भी ऐसा कौन बुद्धिमान् पुरुष है, जो उनके न रहनेपर भी केवल सम्भावनामात्रसे स्तुति करनेवालोंद्वारा अपनी स्तुति करायेगा? यदि यह विद्याभ्यास करता तो इसमें अमुक-अमुक गुण हो जाते—इस प्रकारकी स्तुतिसे तो मनुष्यकी वंचना की जाती है। वह मन्दमति यह नहीं समझता कि इस प्रकार तो लोग उसका उपहास ही कर रहे हैं॥ २४॥

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