श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.16.11

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 16 · अथ षोडशोऽध्यायः

दुरासदो दुर्विषह आसन्‍नोऽपि विदूरवत्।

नैवाभिभवितुं शक्यो वेनारण्युत्थितोऽनलः॥ ११

durāsado durviṣaha āsanno'pi vidūravat|

naivābhibhavituṃ śakyo venāraṇyutthito'nalaḥ|| 11

अर्थ

‘महाराज पृथु वेनरूप अरणिके मन्थनसे प्रकट हुए अग्‍निके समान हैं। शत्रुओंके लिये ये अत्यन्त दुर्धर्ष और दुःसह होंगे। ये उनके समीप रहनेपर भी, सेनादिसे सुरक्षित रहनेके कारण, बहुत दूर रहनेवाले-से होंगे। शत्रु कभी इन्हें हरा न सकेंगे॥ ११॥

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