॥ श्रीहरिः ॥
रंजयिष्यति यल्लोकमयमात्मविचेष्टितैः।
अथामुमाहू राजानं मनोरंजनकैः प्रजाः॥ १५
raṃjayiṣyati yallokamayamātmaviceṣṭitaiḥ|
athāmumāhū rājānaṃ manoraṃjanakaiḥ prajāḥ|| 15
अर्थ
ये अपने कार्योंसे सब लोकोंको सुख पहुँचावेंगे—उनका रंजन करेंगे; इससे उन मनोरंजनात्मक व्यापारोंके कारण प्रजा इन्हें ‘राजा’ कहेगी॥ १५॥
रंजयिष्यति यल्लोकमयमात्मविचेष्टितैः।
अथामुमाहू राजानं मनोरंजनकैः प्रजाः॥ १५
ये अपने कार्योंसे सब लोकोंको सुख पहुँचावेंगे—उनका रंजन करेंगे; इससे उन मनोरंजनात्मक व्यापारोंके कारण प्रजा इन्हें ‘राजा’ कहेगी॥ १५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.16.15 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 487) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/16/15/