श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.17.1

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 17 · अथ सप्तदशोऽध्यायः

अथ सप्तदशोऽध्यायः

महाराज पृथुका पृथ्वीपर कुपित होना और पृथ्वीके द्वारा उनकी स्तुति करना

मैत्रेय उवाच

एवं स भगवान् वैन्यः ख्यापितो गुणकर्मभिः।

छन्दयामास तान् कामैः प्रतिपूज्याभिनन्द्य च॥ १

evaṃ sa bhagavān vainyaḥ khyāpito guṇakarmabhiḥ|

chandayāmāsa tān kāmaiḥ pratipūjyābhinandya ca|| 1

अर्थ

श्रीमैत्रेयजी कहते हैं—इस प्रकार जब वन्दीजनने महाराज पृथुके गुण और कर्मोंका बखान करके उनकी प्रशंसा की, तब उन्होंने भी उनकी बड़ाई करके तथा उन्हें मनचाही वस्तुएँ देकर सन्तुष्ट किया॥ १॥

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