श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.17.29

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 17 · अथ सप्तदशोऽध्यायः

धरोवाच

नमः परस्मै पुरुषाय मायया

विन्य१स्तनानातनवे गुणात्मने।

नमः स्वरूपानुभवेन निर्धुत-

द्रव्यक्रियाकारकविभ्रमोर्मये ॥ २९

namaḥ parasmai puruṣāya māyayā

vinyastanānātanave guṇātmane|

namaḥ svarūpānubhavena nirdhuta-

dravyakriyākārakavibhramormaye || 29

अर्थ

पृथ्वीने कहा—आप साक्षात् परमपुरुष हैं तथा अपनी मायासे अनेक प्रकारके शरीर धारणकर गुणमय जान पड़ते हैं; वास्तवमें आत्मानुभवके द्वारा आप अधिभूत, अध्यात्म और अधिदैवसम्बन्धी अभिमान और उससे उत्पन्‍न हुए राग-द्वेषादिसे सर्वथा रहित हैं। मैं आपको बार-बार नमस्कार करती हूँ॥ २९॥

टिप्पणियाँ

  1. १

    प्रा० पा०—न्यस्तमायात०।

    (मुद्रित पृष्ठ 491)

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