॥ श्रीहरिः ॥
ऋषयो दुदुहुर्देवीमिन्द्रियेष्वथ सत्तम।
वत्सं बृहस्पतिं कृत्वा पयश्छन्दोमयं शुचि॥ १४
ṛṣayo duduhurdevīmindriyeṣvatha sattama|
vatsaṃ bṛhaspatiṃ kṛtvā payaśchandomayaṃ śuci|| 14
अर्थ
ऋषियोंने बृहस्पतिजीको बछड़ा बनाकर इन्द्रिय (वाणी, मन और श्रोत्र) रूप पात्रमें पृथ्वीदेवीसे वेदरूप पवित्र दूध दुहा॥ १४॥✎ 400
ऋषयो दुदुहुर्देवीमिन्द्रियेष्वथ सत्तम।
वत्सं बृहस्पतिं कृत्वा पयश्छन्दोमयं शुचि॥ १४
ऋषियोंने बृहस्पतिजीको बछड़ा बनाकर इन्द्रिय (वाणी, मन और श्रोत्र) रूप पात्रमें पृथ्वीदेवीसे वेदरूप पवित्र दूध दुहा॥ १४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.18.14 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 494) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/18/14/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
- #400 शब्दोंके बीचका स्थान: पात्रमेंमदिरा → पात्रमें मदिरा