॥ श्रीहरिः ॥
गन्धर्वाप्सरसोऽधुक्षन् पात्रे पद्ममये पयः।
वत्सं विश्वावसुं कृत्वा गान्धर्वं२ मधु सौभगम्३॥ १७
gandharvāpsaraso'dhukṣan pātre padmamaye payaḥ|
vatsaṃ viśvāvasuṃ kṛtvā gāndharvaṃ madhu saubhagam|| 17
अर्थ
गन्धर्व और अप्सराओंने विश्वावसुको बछड़ा बनाकर कमलरूप पात्रमें संगीतमाधुर्य और सौन्दर्यरूप दूध दुहा॥ १७॥✎ 400
गन्धर्वाप्सरसोऽधुक्षन् पात्रे पद्ममये पयः।
वत्सं विश्वावसुं कृत्वा गान्धर्वं मधु सौभगम्॥ १७
गन्धर्व और अप्सराओंने विश्वावसुको बछड़ा बनाकर कमलरूप पात्रमें संगीतमाधुर्य और सौन्दर्यरूप दूध दुहा॥ १७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.18.17 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 494) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/18/17/टिप्पणियाँ
- २
प्रा० पा०—गन्धं।
(मुद्रित पृष्ठ 494) - ३
प्रा० पा०—ससौभगम्।
(मुद्रित पृष्ठ 494)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
- #400 शब्दोंके बीचका स्थान: पात्रमेंमदिरा → पात्रमें मदिरा