॥ श्रीहरिः ॥
क्रव्यादाः प्राणिनः क्रव्यं दुदुहुः स्वे१ कलेवरे।
सुपर्णवत्सा विहगाश्चरं चाचरमेव च॥ २४
kravyādāḥ prāṇinaḥ kravyaṃ duduhuḥ sve kalevare|
suparṇavatsā vihagāścaraṃ cācarameva ca|| 24
अर्थ
पशुओंने भगवान् रुद्रके वाहन बैलको वत्स बनाकर वनरूप पात्रमें तृणरूप दूध दुहा। बड़ी-बड़ी दाढ़ोंवाले मांसभक्षी जीवोंने सिंहरूप बछड़ेके द्वारा अपने शरीररूप पात्रमें कच्चा मांसरूप दूध दुहा तथा गरुडजीको वत्स बनाकर पक्षियोंने कीट-पतंगादि चर और फलादि अचर पदार्थोंको दुग्धरूपसे दुहा॥ २३-२४॥
यह अर्थ श्लोक 23–24 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।
क्रव्यादाः प्राणिनः क्रव्यं दुदुहुः स्वे कलेवरे।
सुपर्णवत्सा विहगाश्चरं चाचरमेव च॥ २४
पशुओंने भगवान् रुद्रके वाहन बैलको वत्स बनाकर वनरूप पात्रमें तृणरूप दूध दुहा। बड़ी-बड़ी दाढ़ोंवाले मांसभक्षी जीवोंने सिंहरूप बछड़ेके द्वारा अपने शरीररूप पात्रमें कच्चा मांसरूप दूध दुहा तथा गरुडजीको वत्स बनाकर पक्षियोंने कीट-पतंगादि चर और फलादि अचर पदार्थोंको दुग्धरूपसे दुहा॥ २३-२४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.18.24 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 495) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/18/24/टिप्पणियाँ
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प्रा० पा०—स्वकले०।
(मुद्रित पृष्ठ 495)