श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.18.30

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 18 · अथाष्टादशोऽध्यायः

अथास्मिन् भगवान् वैन्यः प्रजानां वृत्तिदः पिता।

निवासान् कल्पयांचक्रे तत्र तत्र यथार्हतः॥ ३०

athāsmin bhagavān vainyaḥ prajānāṃ vṛttidaḥ pitā|

nivāsān kalpayāṃcakre tatra tatra yathārhataḥ|| 30

अर्थ

वे पिताके समान अपनी प्रजाके पालन-पोषणकी व्यवस्थामें लगे हुए थे। उन्होंने इस समतल भूमिमें प्रजावर्गके लिये जहाँ-तहाँ यथायोग्य निवासस्थानोंका विभाग किया॥ ३०॥

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