अत्रि मुनिके इस प्रकार उत्साहित करनेपर पृथुकुमार क्रोधमें भर गया। इन्द्र बड़ी तेजीसे आकाशमें जा रहे थे। उनके पीछे वह इस प्रकार दौड़ा, जैसे रावणके पीछे जटायु॥ १६॥
एवं वैन्यसुतः प्रोक्तस्त्वरमाणं विहायसा।
अन्वद्रवदभिक्रुद्धो रावणं गृध्रराडिव॥ १६
अत्रि मुनिके इस प्रकार उत्साहित करनेपर पृथुकुमार क्रोधमें भर गया। इन्द्र बड़ी तेजीसे आकाशमें जा रहे थे। उनके पीछे वह इस प्रकार दौड़ा, जैसे रावणके पीछे जटायु॥ १६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.19.16 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 497) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/19/16/