श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.19.9

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 19 · अथैकोनविंशोऽध्यायः

सिन्धवो रत्ननिकरान् गिरयोऽन्‍नं चतुर्विधम्।

उपायनमुपाजह्रुः सर्वे लोकाः सपालकाः॥ ९

sindhavo ratnanikarān girayo'nnaṃ caturvidham|

upāyanamupājahruḥ sarve lokāḥ sapālakāḥ|| 9

अर्थ

समुद्र बहुत-सी रत्नराशियाँ, पर्वत भक्ष्य, भोज्य, चोष्य और लेह्य—चार प्रकारके अन्‍न तथा लोकपालोंके सहित सम्पूर्ण लोक तरह-तरहके उपहार उन्हें समर्पण करते थे॥ ९॥✎ 401

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #401 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें