॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 4.2.11
एष मे शिष्यतां प्राप्तो यन्मे दुहितुरग्रहीत्।
पाणिं विप्राग्निमुखतः सावित्र्या इव साधुवत्॥ ११
eṣa me śiṣyatāṃ prāpto yanme duhituragrahīt|
pāṇiṃ viprāgnimukhataḥ sāvitryā iva sādhuvat|| 11
अर्थ
बन्दरके-से नेत्रवाले इसने सत्पुरुषोंके समान मेरी सावित्री-सरीखी मृगनयनी पवित्र कन्याका अग्नि और ब्राह्मणोंके सामने पाणिग्रहण किया था, इसलिये यह एक प्रकार मेरे पुत्रके समान हो गया है। उचित तो यह था कि यह उठकर मेरा स्वागत करता, मुझे प्रणाम करता; परंतु इसने वाणीसे भी मेरा सत्कार नहीं किया॥ ११-१२॥