॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 4.2.13
लुप्तक्रियायाशुचये मानिने भिन्नसेतवे।
अनिच्छन्नप्यदां बालां शूद्रायेवोशतीं गिरम्॥ १३
luptakriyāyāśucaye mānine bhinnasetave|
anicchannapyadāṃ bālāṃ śūdrāyevośatīṃ giram|| 13
अर्थ
हाय! जिस प्रकार शूद्रको कोई वेद पढ़ा दे, उसी प्रकार मैंने इच्छा न होते हुए भी भावीवश इसको अपनी सुकुमारी कन्या दे दी! इसने सत्कर्मका लोप कर दिया, यह सदा अपवित्र रहता है, बड़ा घमण्डी है और धर्मकी मर्यादाको तोड़ रहा है॥ १३॥