श्रीमैत्रेयजी कहते हैं—विदुरजी! दक्षने इस प्रकार महादेवजीको बहुत कुछ बुरा-भला कहा; तथापि उन्होंने इसका कोई प्रतीकार नहीं किया, वे पूर्ववत् निश्चलभावसे बैठे रहे। इससे दक्षके क्रोधका पारा और भी ऊँचा चढ़ गया और वे जल हाथमें लेकर उन्हें शाप देनेको तैयार हो गये॥ १७॥
विनिन्द्यैवं स गिरिशमप्रतीपमवस्थितम्।
दक्षोऽथाप उपस्पृश्य क्रुद्धः शप्तुं प्रचक्रमे॥ १७
श्रीमैत्रेयजी कहते हैं—विदुरजी! दक्षने इस प्रकार महादेवजीको बहुत कुछ बुरा-भला कहा; तथापि उन्होंने इसका कोई प्रतीकार नहीं किया, वे पूर्ववत् निश्चलभावसे बैठे रहे। इससे दक्षके क्रोधका पारा और भी ऊँचा चढ़ गया और वे जल हाथमें लेकर उन्हें शाप देनेको तैयार हो गये॥ १७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.2.17 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 413) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/2/17/