श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.2.19

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

निषिध्यमानः स सदस्यमुख्यै-

र्दक्षो गिरित्राय विसृज्य शापम्।

तस्माद्विनिष्क्रम्य विवृद्धमन्यु-

र्जगाम कौरव्य निजं निकेतनम्॥ १९

niṣidhyamānaḥ sa sadasyamukhyai-

rdakṣo giritrāya visṛjya śāpam|

tasmādviniṣkramya vivṛddhamanyu-

rjagāma kauravya nijaṃ niketanam|| 19

अर्थ

उपस्थित मुख्य-मुख्य सभासदोंने उन्हें बहुत मना किया, परन्तु उन्होंने किसीकी न सुनी; महादेवजीको शाप दे ही दिया। फिर वे अत्यन्त क्रोधित हो उस सभासे निकलकर अपने घर चले गये॥ १९॥

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें