यह मूर्ख कर्ममयी अविद्याको ही विद्या समझता है; इसलिये यह और जो लोग भगवान् शङ्करका अपमान करनेवाले इस दुष्टके पीछे-पीछे चलनेवाले हैं, वे सभी जन्म-मरणरूप संसारचक्रमें पड़े रहें॥ २४॥
विद्याबुद्धिरविद्यायां कर्ममय्यामसौ जडः।
संसरन्त्विह ये चामुमनु शर्वावमानिनम्॥ २४
यह मूर्ख कर्ममयी अविद्याको ही विद्या समझता है; इसलिये यह और जो लोग भगवान् शङ्करका अपमान करनेवाले इस दुष्टके पीछे-पीछे चलनेवाले हैं, वे सभी जन्म-मरणरूप संसारचक्रमें पड़े रहें॥ २४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.2.24 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 414) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/2/24/