śāntiṃ me samavasthānaṃ brahma kaivalyamaśnute|| 10
अर्थ
चित्त शुद्ध होनेपर उसका विषयोंसे सम्बन्ध नहीं रहता तथा उसे तत्त्वज्ञानकी प्राप्ति हो जाती है। फिर तो वह मेरी समतारूप स्थितिको प्राप्त हो जाता है। यही परम शान्ति, ब्रह्म अथवा कैवल्य है॥ १०॥
परित्यक्तगुणः सम्यग्दर्शनो विशदाशयः।
शान्तिं मे समवस्थानं ब्रह्म कैवल्यमश्नुते॥ १०
चित्त शुद्ध होनेपर उसका विषयोंसे सम्बन्ध नहीं रहता तथा उसे तत्त्वज्ञानकी प्राप्ति हो जाती है। फिर तो वह मेरी समतारूप स्थितिको प्राप्त हो जाता है। यही परम शान्ति, ब्रह्म अथवा कैवल्य है॥ १०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.20.10 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 501) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/20/10/