॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 4.20.12
भिन्नस्य लिंगस्य गुणप्रवाहो
द्रव्यक्रियाकारकचेतनात्मनः ।
दृष्टासु सम्पत्सु विपत्सु सूरयो
न विक्रियन्ते मयि बद्धसौहृदाः॥ १२
bhinnasya liṃgasya guṇapravāho
dravyakriyākārakacetanātmanaḥ |
dṛṣṭāsu sampatsu vipatsu sūrayo
na vikriyante mayi baddhasauhṛdāḥ|| 12
अर्थ
राजन्! गुणप्रवाहरूप आवागमन तो भूत, इन्द्रिय, इन्द्रियाभिमानी देवता और चिदाभास—इन सबकी समष्टिरूप परिच्छिन्न लिंगशरीरका ही हुआ करता है; इसका सर्वसाक्षी आत्मासे कोई सम्बन्ध नहीं है। मुझमें दृढ़ अनुराग रखनेवाले बुद्धिमान् पुरुष सम्पत्ति और विपत्ति प्राप्त होनेपर कभी हर्ष-शोकादि विकारोंके वशीभूत नहीं होते॥ १२॥