श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.20.17

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 20 · अथ विंशोऽध्यायः

मैत्रेय उवाच

स इत्थं लोकगुरुणा विष्वक्सेनेन विश्‍वजित्।

अनुशासित आदेशं शिरसा जगृहे हरेः॥ १७

sa itthaṃ lokaguruṇā viṣvaksenena viśvajit|

anuśāsita ādeśaṃ śirasā jagṛhe hareḥ|| 17

अर्थ

श्रीमैत्रेयजी कहते हैं—विदुरजी! सर्वलोकगुरु श्रीहरिके इस प्रकार कहनेपर जगद्विजयी महाराज पृथुने उनकी आज्ञा शिरोधार्य की॥ १७॥

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