॥ श्रीहरिः ॥
भगवानथ विश्वात्मा पृथुनोपहृतार्हणः।
समुज्जिहानया भक्त्या गृहीतचरणाम्बुजः॥ १९
bhagavānatha viśvātmā pṛthunopahṛtārhaṇaḥ|
samujjihānayā bhaktyā gṛhītacaraṇāmbujaḥ|| 19
अर्थ
फिर महाराज पृथुने विश्वात्मा भक्तवत्सल भगवान्का पूजन किया और क्षण-क्षणमें उमड़ते हुए भक्तिभावमें निमग्न होकर प्रभुके चरणकमल पकड़ लिये॥ १९॥
भगवानथ विश्वात्मा पृथुनोपहृतार्हणः।
समुज्जिहानया भक्त्या गृहीतचरणाम्बुजः॥ १९
फिर महाराज पृथुने विश्वात्मा भक्तवत्सल भगवान्का पूजन किया और क्षण-क्षणमें उमड़ते हुए भक्तिभावमें निमग्न होकर प्रभुके चरणकमल पकड़ लिये॥ १९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.20.19 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 502) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/20/19/