प्रभु अपने चरणकमलोंसे पृथ्वीको स्पर्श किये खड़े थे; उनका कराग्रभाग गरुडजीके ऊँचे कंधेपर रखा हुआ था। महाराज पृथु नेत्रोंके आँसू पोंछकर अतृप्त दृष्टिसे उनकी ओर देखते हुए इस प्रकार कहने लगे॥ २२॥
अथावमृज्याश्रुकला विलोकयन्
अतृप्तदृग्गोचरमाह पूरुषम्।
पदा स्पृशन्तं क्षितिमंस उन्नते
विन्यस्तहस्ताग्रमुरंगविद्विषः ॥ २२
प्रभु अपने चरणकमलोंसे पृथ्वीको स्पर्श किये खड़े थे; उनका कराग्रभाग गरुडजीके ऊँचे कंधेपर रखा हुआ था। महाराज पृथु नेत्रोंके आँसू पोंछकर अतृप्त दृष्टिसे उनकी ओर देखते हुए इस प्रकार कहने लगे॥ २२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.20.22 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 503) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/20/22/