उत्तम कीर्तिवाले प्रभो! सत्संगमें आपके मंगलमय सुयशको दैववश एक बार भी सुन लेनेपर कोई पशुबुद्धि पुरुष भले ही तृप्त हो जाय; गुणग्राही उसे कैसे छोड़ सकता है? सब प्रकारके पुरुषार्थोंकी सिद्धिके लिये स्वयं लक्ष्मीजी भी आपके सुयशको सुनना चाहती हैं॥ २६॥✎ 1330
यशः शिवं सुश्रव आर्यसंगमे
यदृच्छया चोपशृणोति ते सकृत्।
कथं गुणज्ञो विरमेद्विना पशुं
श्रीर्यत्प्रवव्रे गुणसंग्रहेच्छया॥ २६
उत्तम कीर्तिवाले प्रभो! सत्संगमें आपके मंगलमय सुयशको दैववश एक बार भी सुन लेनेपर कोई पशुबुद्धि पुरुष भले ही तृप्त हो जाय; गुणग्राही उसे कैसे छोड़ सकता है? सब प्रकारके पुरुषार्थोंकी सिद्धिके लिये स्वयं लक्ष्मीजी भी आपके सुयशको सुनना चाहती हैं॥ २६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.20.26 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 503) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/20/26/
टिप्पणियाँ
७
प्रा० पा०—विरमेदृते।
(मुद्रित पृष्ठ 503)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#1330 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): चरण-कमलोंका → चरणकमलोंका