श्रीमैत्रेयजी कहते हैं—विदुरजी! इस प्रकार भगवान्ने राजर्षि पृथुके सारगर्भित वचनोंका आदर किया। फिर पृथुने उनकी पूजा की और प्रभु उनपर सब प्रकार कृपा कर वहाँसे चलनेको तैयार हुए॥ ३४॥✎ 406407
इति वैन्यस्य राजर्षेः प्रतिनन्द्यार्थवद्वचः।
पूजितोऽनुगृहीत्वैनं गन्तुं चक्रेऽच्युतो मतिम्॥ ३४
श्रीमैत्रेयजी कहते हैं—विदुरजी! इस प्रकार भगवान्ने राजर्षि पृथुके सारगर्भित वचनोंका आदर किया। फिर पृथुने उनकी पूजा की और प्रभु उनपर सब प्रकार कृपा कर वहाँसे चलनेको तैयार हुए॥ ३४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.20.34 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 505) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/20/34/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)