श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.20.37

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 20 · अथ विंशोऽध्यायः

भगवानपि राजर्षेः सोपाध्यायस्य चाच्युतः।

हरन्‍निव मनोऽमुष्य स्वधाम प्रत्यपद्यत१॥ ३७

bhagavānapi rājarṣeḥ sopādhyāyasya cācyutaḥ|

haranniva mano'muṣya svadhāma pratyapadyata|| 37

अर्थ

भगवान् अच्युत भी राजा पृथु एवं उनके पुरोहितोंका चित्त चुराते हुए अपने धामको सिधारे॥ ३७॥✎ 406 407

टिप्पणियाँ

  1. १

    प्रा० पा०—प्रत्यगात्पुनः।

    (मुद्रित पृष्ठ 505)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #406 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् को → भगवान्‌को
  • #407 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने

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