इस प्रकार जो इस शरीरमें ही आसक्त नहीं है, वह विवेकी पुरुष इससे उत्पन्न हुए घर, पुत्र और धन आदिमें भी किस प्रकार ममता रख सकता है॥ ६॥
असंसक्तः शरीरेऽस्मिन्नमुनोत्पादिते गृहे।
अपत्ये द्रविणे वापि कः कुर्यान्ममतां बुधः॥ ६
इस प्रकार जो इस शरीरमें ही आसक्त नहीं है, वह विवेकी पुरुष इससे उत्पन्न हुए घर, पुत्र और धन आदिमें भी किस प्रकार ममता रख सकता है॥ ६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.20.6 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 501) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/20/6/