श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.20.8

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 20 · अथ विंशोऽध्यायः

य एवं सन्तमात्मानमात्मस्थं वेद पूरुषः।

नाज्यते प्रकृतिस्थोऽपि तद‍्गुणैः स मयि स्थितः॥ ८

ya evaṃ santamātmānamātmasthaṃ veda pūruṣaḥ|

nājyate prakṛtistho'pi tadguṇaiḥ sa mayi sthitaḥ|| 8

अर्थ

जो पुरुष इस देहस्थित आत्माको इस प्रकार शरीरसे भिन्‍न जानता है, वह प्रकृतिसे सम्बन्ध रखते हुए भी उसके गुणोंसे लिप्त नहीं होता; क्योंकि उसकी स्थिति मुझ परमात्मामें रहती है॥ ८॥

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