श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.21.11

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 21 · अथैकविंशोऽध्यायः

मैत्रेय उवाच

गंगायमुनयोर्नद्योरन्तराक्षेत्रमावसन् ।

आरब्धानेव बुभुजे भोगान् पुण्यजिहासया॥ ११

gaṃgāyamunayornadyorantarākṣetramāvasan |

ārabdhāneva bubhuje bhogān puṇyajihāsayā|| 11

अर्थ

श्रीमैत्रेयजीने कहा—साधुश्रेष्ठ विदुरजी! महाराज पृथु गंगा और यमुनाके मध्यवर्ती देशमें निवास कर अपने पुण्यकर्मोंके क्षयकी इच्छासे प्रारब्धवश प्राप्त हुए भोगोंको ही भोगते थे॥ ११॥✎ 1332

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1332 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): नक्षत्र-मण्डलमें → नक्षत्रमण्डलमें

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