उस समाजमें महाराज पृथुने उन पूजनीय अतिथियोंका यथायोग्य सत्कार किया और फिर उस सभामें, नक्षत्रमण्डलमें चन्द्रमाके समान खड़े हो गये॥ १४॥✎ 1332
तस्मिन्नर्हत्सु सर्वेषु स्वर्चितेषु यथार्हतः।
उत्थितः सदसो मध्ये ताराणामुडुराडिव॥ १४
उस समाजमें महाराज पृथुने उन पूजनीय अतिथियोंका यथायोग्य सत्कार किया और फिर उस सभामें, नक्षत्रमण्डलमें चन्द्रमाके समान खड़े हो गये॥ १४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.21.14 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 507) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/21/14/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#1332 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): नक्षत्र-मण्डलमें → नक्षत्रमण्डलमें