॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 4.21.2
चन्दनागुरुतोयार्द्ररथ्याचत्वरमार्गवत् ।
पुष्पाक्षतफलैस्तोक्मैर्लाजैरर्चिर्भिरर्चितम्॥ २
candanāgurutoyārdrarathyācatvaramārgavat |
puṣpākṣataphalaistokmairlājairarcirbhirarcitam|| 2
अर्थ
उसकी गलियाँ, चौक और सड़कें चन्दन और अरगजेके जलसे सींच दी गयी थीं तथा उसे पुष्प, अक्षत, फल, यवांकुर, खील और दीपक आदि मांगलिक द्रव्योंसे सजाया गया था॥ २॥