श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.21.22

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 21 · अथैकविंशोऽध्यायः

अहं दण्डधरो राजा प्रजानामिह योजितः।

रक्षिता वृत्तिदः स्वेषु सेतुषु स्थापिता पृथक्॥ २२

ahaṃ daṇḍadharo rājā prajānāmiha yojitaḥ|

rakṣitā vṛttidaḥ sveṣu setuṣu sthāpitā pṛthak|| 22

अर्थ

इस लोकमें मुझे प्रजाजनोंका शासन, उनकी रक्षा, उनकी आजीविकाका प्रबन्ध तथा उन्हें अलग-अलग अपनी मर्यादामें रखनेके लिये राजा बनाया गया है॥ २२॥✎ 408

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #408 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् को → भगवान्‌को

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