श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.21.25

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 21 · अथैकविंशोऽध्यायः

तत् प्रजा भर्तृपिण्डार्थं स्वार्थमेवानसूयवः।

कुरुताधोक्षजधियस्तर्हि मेऽनुग्रहः कृतः॥ २५

tat prajā bhartṛpiṇḍārthaṃ svārthamevānasūyavaḥ|

kurutādhokṣajadhiyastarhi me'nugrahaḥ kṛtaḥ|| 25

अर्थ

अतः प्रिय प्रजाजन! अपने इस राजाका परलोकमें हित करनेके लिये आपलोग परस्पर दोषदृष्टि छोड़कर हृदयसे भगवान्‌को याद रखते हुए अपने-अपने कर्तव्यका पालन करते रहिये; क्योंकि आपका स्वार्थ भी इसीमें है और इस प्रकार मुझपर भी आपका बड़ा अनुग्रह होगा॥ २५॥✎ 408

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #408 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् को → भगवान्‌को

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