॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 4.21.30
दौहित्रादीनृते मृत्योः शोच्यान् धर्मविमोहितान्।
वर्गस्वर्गापवर्गाणां प्रायेणैकात्म्यहेतुना॥ ३०
dauhitrādīnṛte mṛtyoḥ śocyān dharmavimohitān|
vargasvargāpavargāṇāṃ prāyeṇaikātmyahetunā|| 30
अर्थ
मनु, उत्तानपाद, महीपति ध्रुव, राजर्षि प्रियव्रत, हमारे दादा अंग तथा ब्रह्मा, शिव, प्रह्लाद, बलि और इसी कोटिके अन्यान्य महानुभावोंके मतमें तो धर्म-अर्थ-काम-मोक्षरूप चतुर्वर्ग तथा स्वर्ग और अपवर्गके स्वाधीन नियामक, कर्मफलदातारूपसे भगवान् गदाधरकी आवश्यकता है ही। इस विषयमें तो केवल मृत्युके दौहित्र वेन आदि कुछ शोचनीय और धर्मविमूढ़ लोगोंका ही मतभेद है। अतः उसका कोई विशेष महत्त्व नहीं हो सकता॥ २८—३०॥✎ 408