श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.21.35

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 21 · अथैकविंशोऽध्यायः

प्रधानकालाशयधर्मसंग्रहे

शरीर एष प्रतिपद्य चेतनाम्।

क्रियाफलत्वेन विभुर्विभाव्यते

यथानलो दारुषु तद‍्गुणात्मकः॥ ३५

pradhānakālāśayadharmasaṃgrahe

śarīra eṣa pratipadya cetanām|

kriyāphalatvena vibhurvibhāvyate

yathānalo dāruṣu tadguṇātmakaḥ|| 35

अर्थ

जिस प्रकार एक ही अग्‍नि भिन्‍न-भिन्‍न काष्ठोंमें उन्हींके आकारादिके अनुरूप भासती है, उसी प्रकार वे सर्वव्यापक प्रभु परमानन्दस्वरूप होते हुए भी प्रकृति, काल, वासना और अदृष्टसे उत्पन्‍न हुए शरीरमें विषयाकार बनी हुई बुद्धिमें स्थित होकर उन यज्ञ-यागादि क्रियाओंके फलरूपसे अनेक प्रकारके जान पड़ते हैं॥ ३५॥

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