श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.21.47

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 21 · अथैकविंशोऽध्यायः

हिरण्यकशिपुश्चापि भगवन्‍निन्दया तमः।

विविक्षुरत्यगात्सूनोः प्रह्रादस्यानुभावतः॥ ४७

hiraṇyakaśipuścāpi bhagavannindayā tamaḥ|

vivikṣuratyagātsūnoḥ prahrādasyānubhāvataḥ|| 47

अर्थ

इसी प्रकार हिरण्यकशिपु भी भगवान्‌की निन्दा करनेके कारण नरकोंमें गिरनेवाला ही था कि अपने पुत्र प्रह्लादके प्रभावसे उन्हें पार कर गया॥ ४७॥✎ 409

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #409 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें