श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.21.49

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 21 · अथैकविंशोऽध्यायः

अहो वयं ह्यद्य पवित्रकीर्ते

त्वयैव नाथेन मुकुन्दनाथाः।

य उत्तमश्लोकतमस्य विष्णो-

र्ब्रह्मण्यदेवस्य कथां व्यनक्ति॥ ४९

aho vayaṃ hyadya pavitrakīrte

tvayaiva nāthena mukundanāthāḥ|

ya uttamaślokatamasya viṣṇo-

rbrahmaṇyadevasya kathāṃ vyanakti|| 49

अर्थ

आपका सुयश बड़ा पवित्र है; आप उदारकीर्ति ब्रह्मण्यदेव श्रीहरिकी कथाओंका प्रचार करते हैं। हमारा बड़ा सौभाग्य है; आज आपको अपने स्वामीके रूपमें पाकर हम अपनेको भगवान्‌के ही राज्यमें समझते हैं॥ ४९॥

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