श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.21.52

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 21 · अथैकविंशोऽध्यायः

नमो विवृद्धसत्त्वाय पुरुषाय महीयसे।

यो ब्रह्म क्षत्रमाविश्य बिभर्तीदं स्वतेजसा॥ ५२

namo vivṛddhasattvāya puruṣāya mahīyase|

yo brahma kṣatramāviśya bibhartīdaṃ svatejasā|| 52

अर्थ

आप शुद्ध सत्त्वमय परमपुरुष हैं, जो ब्राह्मणजातिमें प्रविष्ट होकर क्षत्रियोंकी और क्षत्रियजातिमें प्रविष्ट होकर ब्राह्मणोंकी तथा दोनों जातियोंमें प्रतिष्ठित होकर सारे जगत‍्की रक्षा करते हैं। हमारा आपको नमस्कार है॥ ५२॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां चतुर्थस्कन्धे एकविंशोऽध्यायः॥ २१॥

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